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गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

PUBLISHED IN JANVANI [ PATHAKVANI ] ON 9 APRIL 2015

 पेशेवर अगर है अपराधी है किशोर नहीं

Supreme Court urges govt to make juvenile law more deterrent

Supreme Court, juvenile law
[The Supreme Court on Monday urged the government to bring about necessary changes in the juvenile law in order to have a deterrent effect and to send a message to the society that life of the victim was equally important under the rule of law ]
उच्चतम न्यायालय ने हत्या ,बलात्कार जैसे गंभीर मामलों में किशोर कानून पर पुनर्विचार की ज़रुरत मानी है .सर्वोच्च अदालत का यह कदम सराहनीय है किन्तु अभी आधा -अधूरा विचारणीय प्रयास ही कहा जायेगा क्योंकि आज की परिस्थितियों में किशोर की परिभाषा में ही परिवर्तन समय की आवश्यकता बन गया है और वह इसलिए क्योंकि आज बहुत से किशोर किशोर रहे ही नहीं हैं वे युवा पेशेवर अपराधियों से भी तेज दिमाग रखकर अपराध के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं .
भारतीय दंड संहिता की धारा ८२ सात वर्ष से कम आयु के शिशु के कार्य को अपराध की श्रेणी से बाहर रखती है किन्तु धारा ८३ सात वर्ष से ऊपर और १२ वर्ष से कम आयु के शिशु के कार्य को परिपक्वता की श्रेणी में रख अपराध मानने या न मानने का प्रावधान करती है .ऐसे में अब जिस तरह से किशोर अपराधियों द्वारा अपराध किये जा रहे हैं उनके अपराध करने के तरीके पर ध्यान देना ज़रूरी हो जाता है .भले ही अपराध डकैती .बलात्कार या हत्या न हो कोई छोटा -मोटा अपराध जैसे जेबकतरी ,छेड़छाड़ ही हो अगर किशोर अपराधी ने पेशेवराना रवैय्या अख्तियार कर अपराध किया है तो उसे पेशेवर अपराधी मानते हुए उसकी आयु का ध्यान छोड़कर उसे अपराधी मानना होगा नहीं तो जरायम की ये दुनिया इन्हें आगे कर इसी तरह कानून को ठेंगा दिखाती रहेगी और अपने मंसूबे पूरे करती रहेगी .

published in janvani [pathakvani] on 9 april 2015

शालिनी कौशिक
[कौशल ]