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शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

Published in Janwani ''PATHAKVANI'' on 10 july 2015


image/jpg: Senior BJP leader Kalyan Singh, during an election campaign rally in Mathura on Sunday night.
Governor of Rajasthan and chancellor Kalyan Singh on Tuesday once again created a controversy by suggesting that the word ‘adhinayak’ in the national anthem should be removed as it praises the British rulers of pre-Independence era.
गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर भारत के बँगला साहित्य के शिरोमणि कवि थे.
उनकी कविता में प्रकृति के सौंदर्य और कोमलतम मानवीय भावनाओं का उत्कृष्ट चित्रण है.
"जन गण मन" उनकी रचित एक विशिष्ट कविता है जिसके प्रथम छंद को हमारे राष्ट्रीय गीत होने का गौरव प्राप्त है.
गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर, काव्यालय की ओर से, आप सबको यह कविता अपने मूल बंगला रूप में प्रस्तुत है.
बंगला मूल
जन गण मन
शब्दार्थ
जन गण मन अधिनायक जय हे
भारत भाग्य विधाता
पंजाब सिन्ध गुजरात मराठा
द्राविड़ उत्कल बंग
विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा
उच्छल जलधि तरंग
तव शुभ नामे जागे
तव शुभ आशिष मागे
गाहे तव जय गाथा
जन गण मंगल दायक जय हे
भारत भाग्य विधाता
जय हे जय हे जय हे
जय जय जय जय हे
अहरह तव आह्वान प्रचारित
शुनि तव उदार वाणी
हिन्दु बौद्ध शिख जैन
पारसिक मुसलमान खृष्टानी
पूरब पश्चिम आशे
तव सिंहासन पाशे
प्रेमहार हय गाँथा
जन गण ऐक्य विधायक जय हे
भारत भाग्य विधाता
जय हे जय हे जय हे
जय जय जय जय हे
अहरह: निरन्तर; तव: तुम्हारा
शुनि: सुनकर
आशे: आते हैं
पाशे: पास में
हय गाँथा: गुँथता है
ऐक्य: एकता
पतन-अभ्युदय-बन्धुर-पंथा
युगयुग धावित यात्री,
हे चिर-सारथी,
तव रथचक्रे मुखरित पथ दिन-रात्रि
दारुण विप्लव-माझे
तव शंखध्वनि बाजे,
संकट-दुख-त्राता,
जन-गण-पथ-परिचायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे
अभ्युदय: उत्थान; बन्धुर: मित्र का
धावित: दौड़ते हैं
माझे: बीच में
त्राता: जो मुक्ति दिलाए
परिचायक: जो परिचय कराता है
घोर-तिमिर-घन-निविड़-निशीथे
पीड़ित मुर्च्छित-देशे
जाग्रत छिल तव अविचल मंगल
नत-नयने अनिमेष
दुःस्वप्ने आतंके
रक्षा करिले अंके
स्नेहमयी तुमि माता,
जन-गण-दुखत्रायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे
निविड़: घोंसला
छिल: था
अनिमेष: अपलक
करिले: किया; अंके: गोद में
रात्रि प्रभातिल उदिल रविछवि
पूर्व-उदय-गिरि-भाले,
गाहे विहन्गम, पुण्य समीरण
नव-जीवन-रस ढाले,
तव करुणारुण-रागे
निद्रित भारत जागे
तव चरणे नत माथा,
जय जय जय हे, जय राजेश्वर,
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे
- रवीन्द्रनाथ ठाकुर
प्रभातिल: प्रभात में बदला; उदिल: उदय हुआ
* * *
कल्याण सिंह जो इस वक्त राजस्थान के राज्यपाल हैं ने एक बार फिर साबित किया है कि भाजपाई देश के बारे में बहुत ही कम और अधिकांशतया गलत ज्ञान ही रखते हैं .उन्होंने अधिनायक शब्द को अंग्रेजों से जोड़कर इसे हटाने की मांग की है जबकि वे स्वयं जानते हैं कि हमारा देश गणतंत्र है और यहाँ जनता का शासन है ऐसे में इसके रचनाकाल के समय भले ही अंग्रेजों का शासन रहा हो भले ही इसकी रचना १९११ में की गयी हो किन्तु जिस वक्त इसे राष्ट्रीय गान के रूप में स्थापित किया गया देश गणतंत्र घोषित किया जा रहा था और देश पर हम भारत के लोगों का ही राज्य स्थापित हो रहा था क्योंकि यह सब हमारे देश के संविधान के अंतर्गत किया जा रहा था जिसकी प्रस्तावना में मुख्य शब्द ही '' हम भारत के लोग '' हैं इसलिए कल्याण सिंह जी को याद रखना चाहिए कि हम ही इस देश के अधिनायक हैं और इसे देश के राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार करने वाले इस देश के लिए अपने प्राणों की परवाह न कर देश पर अपना सर्वस्व लुटाने वाले न कि सत्ता की खातिर अपमान के घूँट पीकर वापस उसी पार्टी में लौटने वाले जिस के अपने संगी-साथियों की विचारधारा पर वे स्वयं ही ऊँगली उठा चुके थे और स्वयं इस पार्टी के खिलाफ मैदान में उतर चुके थे .
अंत में ,उन्हें एक बात और याद कर लेनी चाहिए कि जिन रविन्द्र नाथ टैगोर जी के द्वारा लिखित ''जन-गण-मन'' में अधिनायक शब्द को वे अंग्रेजों के प्रति भक्ति से जोड़ रहे हैं उन्ही रविन्द्र नाथ जी ने जलियाँ वाला कांड के विरोध में अंग्रेजों द्वारा दी गयी '' नाइट-हुड '' की उपाधि को लौटा दिया था .
Published in Janwani ''PATHAKVANI'' on 10 july 2015

शालिनी कौशिक
[कौशल]

शनिवार, 20 जून 2015

दैनिक जागरण के जागरण जंक्शन में प्रकाशित 21.6.2015 को

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आजकल चारों तरफ भारत में बस एक ही चर्चा है कोई कह रहा है कि हम इसमें शामिल होंगे तो कोई कह रहा है हम इसे नहीं मनाएंगे इशारा है केवल और केवल अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की तरफ जिसे भाजपा भुनाने की मुहीम में जुटी है .देश की संस्कृति में सदियों से रची बसी इस अमूल्य निधि को हड़पने की कोशिश में भाजपा अपने तन मन से जुट गयी है .ठीक वैसे ही जैसे राम मंदिर को और राम को अपनी निधि भाजपा ने ऐसे दिखाया कि अगर कोई और आज के समय में ''जय श्री राम '' का उच्चारण कर ले तो फ़ौरन भाजपाइयों को अपनी सत्ता पर खतरा महसूस होने लगता है और वे फ़ौरन कुत्सित राजनीतिक टिप्पणियों पर आ जाते है जैसे राम नाम लेने का अधिकार केवल भाजपा को है .ऐसे में सिवाय इसके और क्या कहा जा सकता है कि जो राम को ही न समझा वह उनका हो ही कैसे सकता है जबकि राम ने तो मानव मात्र में भेद न करना ही सिखाया था और ये तो भाई-भाई में ही भेदभाव को पैदा कर रहे हैं .ऐसे ही योग को अपनी बपौती मानते हुए आज ये केवल योग योग का उच्चारण कर रहे हैं और ऐसा दिखा रहे हैं जैसे योग के ये ही मालिक हैं और इनका यह दिखाना ही इस देश में योग के लिए ऐसे ऐसे बयानों को जन्म दे रहा है जिनका योग के गुण-प्रभाव से दूर दूर तक भी कोई नाता नहीं है .जहाँ तक हम सब योग के बारे में जानते हैं यह कोई साधना की पद्धति नहीं है यह आज के तनावपूर्ण भौतिकवादी जीवन से मनुष्य मात्र को शांति पहुँचाने का एक साधन है और शरीर के अंगों पर पड़ते जीवन के काम-काज के दुष्प्रभाव दूर करने के लिए इसे हमारे ऋषियों-मुनियों द्वारा आज़माया जाता रहा है और इसलिए इसका इस्तेमाल हमेशा से भारत में होता रहा है किन्तु भाजपा को देश की ऐसी अमूल्य निधियों को हड़पने की हमेशा से महत्वाकांक्षा रही है जिसके माध्यम से वह यहाँ के एक समुदाय को अपनी ओर खींचकर उसके मन में दुसरे समुदाय के प्रति द्वेषभाव भर सके और वह इसीका माध्यम अब योग को बना रही है और इसी कारण योग को लेकर गलत और जहर भरी बयान बाजी हो रही है और भाजपा इसे निरंतर तूल दे रही है कभी प्रधानमंत्री के योग के समाचार आ रहे हैं कभी अमित शाह पटना में मुस्लिम योग टीचर से विशेष प्रशिक्षण की बात कर रहे हैं कभी रविशंकर प्रसाद ,रूडी ,राधा मोहन सिंह ,राम कृपाल यादव के पटना में विशेष योग कैम्प में शामिल होने की बातें समाचारों में आ रही हैं आखिर क्यों केवल योग योग को ही गाया जा रहा है जून में और भी दिवस इस बीच में पड़े हैं किन्तु उनमे भाजपा ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई न ही कोई कार्यवाही उनके सम्बन्ध में हुई .वे दिवस इस प्रकार हैं -
५ जून -विश्व पर्यावरण दिवस
८ जून -विश्व महासागर दिवस
१२ जून -विश्व बालश्रम निरोध दिवस
१४ जून -विश्व रक्तदान दिवस
१५ जून -World Elder Abuse Awarness Day
१७ जून -World Day to Combat Desertification
२० जून -विश्व शरणार्थी दिवस
२१ जून -विश्व योग दिवस
इनका अवलोकन किये जाने पर हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि न तो १२ जून को बालश्रम के समबन्ध में भाजपा ने कोई स्वस्थ प्रतिक्रिया दी न १४ जून को भाजपाइयों ने रक्तदान किया और ही अन्य दिवसों में कोई सार्वजनिक कार्यक्रम के जरिये इनपर कोई सन्देश जनता तक पहुँचाया गया .केवल योग योग को ही गाकर भाजपा इसे अपनाना चाह रही है और इसे राम मंदिर की तरह इस देश में अपने वोट बैंक में शामिल करना चाह रही है जबकि यह हमेशा से इस देश और देशवासियों की निधि रहा है और रहेगा .हिन्दू मुस्लिम को इस तरीके से बाँटने की भाजपा की राजनीति इस देश में नहीं चल पायेगी यहाँ हिन्दू भी योगी रहा है और मुस्लिम भी .
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सम्राट अकबर की जीवन चर्या और हमारे योगियों की जीवनचर्या यहाँ योग पर ही आधारित रही है और ये दोनों हिन्दू-मुस्लिम के दिलों दिमाग पर रहना ही चाहिए न कि भाजपा की हडपों और बांटों की राजनीति .
[दैनिक जागरण के जागरण जंक्शन में प्रकाशित 21.6.2015 को]
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शालिनी कौशिक
[कौशल ]

गुरुवार, 4 जून 2015

published in janvani ''pathakvani '' 4 june 2015


मॉनसून देगा इस बार भी धोखा
'अच्छे दिन ' जाने वाले हैं ,मौसम विभाग ने दिए सूखे के संकेत ,17 साल पुराने केस में BJP विधायक समेत 15 दोषी,पी ओ के में पाक की 'चुनावी चाल' से भारत नाराज़ ,हद है! चलती रोडवेज बस में युवती से फिर गंदी हरकत [सभी अमर उजाला से साभार ]
रोपड़ व काठगढ़ के बीच युवक ने बदतमीजी शुरू कर दी
प्रधानमंत्री मोदी जी कहते हैं कि 'देश के अच्छे दिन आ गए ''.वे देश में अच्छे दिन लाने का वादा कर सत्ता में आये हैं और ये तो साफ है कि वे अपने वादे को पूरा करने के लिए जी जान से जुटे हुए हैं और इसके लिए उन्होंने अपनी पूरी फ़ौज को लगा रखा है लेकिन सच्चाई को नकारना न तो उनके हित में है और न ही देश के .समाचार पत्र के जिस पेज पर उनकी अच्छे दिन आने की सूचना को मात्र एक छोटा कॉलम मिला है उसी पेज पर इस सच्चाई को पूरा पेज मिला है कि देश की वास्तविक स्थिति इस वक्त क्या है ?'' देवबंद के पी.एन.बी.में १०.६१ लाख रूपये की डकैती ,बी.एस.एन .एल .कर्मी ने दफ्तर में जहर खाकर दी जान ,तीसरी बार लीक हुआ यूपीटीयू का पेपर '' ये तो आज के समाचार हैं और समाचार तो अभी जानते ही हैं -पश्चिमी यु पी में बारिश से फसल बर्बाद ,किसानों द्वारा रोज आत्महत्याओं का बढ़ता आंकड़ा ,रोज बढ़ती जा रही रेप की घटनाएँ ,दंगों के कारण खाली होते वेस्ट यु पी के कसबे , पाकिस्तान की बढ़ती जा रही कारगुजारियां ,महंगाई के कारण आम आदमी से छिनती रोटी -दाल और न जाने क्या क्या रोज समाचार पत्रों में पढ़ रहे हैं और स्वयं अपने आस पास देख भी रहे हैं अगर ऐसे हालत को देखते हुए देश के अच्छे दिन कहे जा सकते हैं और एक विशाल बहुमत लेकर जननायक के तौर पर उभरने वाले मोदी जी को वे ' देश के अच्छे दिन ' लग सकते हैं तो शायद ऐसा ही होगा क्योंकि वे गलत कैसे हो सकते हैं उनके जैसा प्रधानमंत्री न पहले कभी देश को मिला है और न ही मिलेगा जो जनता के जलते दिल-उजड़ती ज़िंदगी को देश के अच्छे दिन कहेगा .इसलिए ऐसे में तो बस यही कहा जा सकता है -
''दुश्मन न करे दोस्त ने जो काम किया है ,
उम्र-भर का गम हमें ईनाम दिया है .''
[PUBLISHED IN JANVANI'S PATHHAKVANI ON 4 JUNE 2015]

शालिनी कौशिक
[कौशल ]

सोमवार, 25 मई 2015

[PUBLISHED IN JANVANI {PATHAKVANI }ON 25.MAY.2015 ]



हरिश्चंद्र ''नाज़'' के ये शब्द आज के एक समाचार पर ध्यान जाते ही मेरे जहन में उभर आये ,शब्द कुछ यूँ थे -
''यूँ गुल खिले हैं बाग़ में ख़ारों के आस-पास ,
जैसे कि गर्दिशें हों सितारों के आस-पास .
रौनक चमन में आ गयी लेकिन न भूलना
शायद खिज़ा छुपी हो बहारों के आस-पास .''
और समाचार कुछ यूँ था -
''महंगाई पर काबू पाना सरकार की अहम उपलब्धि -जेटली ''
और महंगाई पर काबू पाना ऐसा ही गुल है जो वर्तमान सरकार जैसी खार के पास खिलने की कोशिश में है किन्तु जैसे कि खार में गुल नहीं खिलते ऐसे ही वर्तमान सरकार द्वारा महंगाई पर काबू जैसे गुल खिलाने की आशा ही व्यर्थ है और अरुण जेटली जी को महंगाई काबू में दिख रही है वह महंगाई जो इस वक्त पिछली यू.पी.ए.सरकार की अपेक्षा भी दिनों दिन तरक्की की राहों पर जा रही है .अगर हम अपनी रोज़मर्रा की चीज़ों का ही आकलन करें तो हमें साफ नज़र आता है कि महंगाई की स्थिति क्या है -अरहर की दाल जो इस सरकार से पहले हमें ७२ रूपये किलो मिल रही थी वह अब १०० रूपये किलो से ऊपर जा रही है .सब्जियां जो पहले कम भाव पर मिलती दिख जाती थी अब कोई भी कम दाम में नहीं मिलती .प्याज़ १२ रूपये किलो की जगह अब २५ रूपये किलो मिल रहा है .फलों में चीकू २० की जगह ४० के भाव में बिक रहा है .रही पेट्रोल -डीज़ल की बात तो जो फायदा इसका अपनी गाड़ी इस्तेमाल करने वालों को हुआ है वो फायदा आम जनता को नहीं क्योंकि किरायों में कहीं कोई कमी नहीं हुई है .
देखा जाये तो मोदी सरकार अभी तक अपने हर वायदे पर खोटी ही साबित हुई है क्योंकि काला धन लाने का वायदा इन्होने खुद ही तोड़ दिया ,अच्छे दिन लाने का इनका इरादा प्रकृति ने तोड़ दिया और जितने किसानों को इनके कार्यकाल के आरम्भ में ही आत्महत्या को गले लगाना पड़ गया उतना आज तक किसी सरकार के कार्यकाल में नहीं करना पड़ा विशेषकर पश्चिमी यूपी के किसानों को .हाँ इतना अवश्य है कि इस सरकार ने इस तरह की परिस्थितियां शायद पहले ही भांप ली थी और इसलिए धारा ३०९ द्वारा घोषित आत्महत्या के अपराध को अपराध की श्रेणी से अलग किये जाने की पहल कर ली थी .ऐसे में जेटली जी द्वारा महंगाई कम होने का बखान और उसका श्रेय मोदी सरकार को देना ऐसे ही कहा जायेगा जैसे ये सब एक झूठ की रात का चाँद ही हो किन्तु अभी इस स्थिति पर अफ़सोस ही किया जा सकता है और आगे आने वाली सरकार से उम्मीद .जो कि कभी भी पूरी होनी मुश्किल है क्योंकि हर सरकार बनने से पहले आम जनता की होती है और बाद में पूंजीपतियों की .इसलिए ए .बी.भारतीय के शब्दों में बस यही कहा जा सकता है -
''झूठ की रात के हर चाँद को ढल जाने दो ,
सच के सूरज को अंधेरों से निकल आने दो ,
धुल कितने ही अज़ाबों की जमीं है इस पर
आज इस दिल को ज़रा अश्कों से नहलाने दो .''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]
[PUBLISHED IN JANVANI {PATHAKVANI }ON 25.MAY.2015 ]

शुक्रवार, 22 मई 2015

[PUBLISHED IN JANWANI''S PATHHAKVANI ON 22MAY2015]


good servant but a bad master -सोशल साइट्स
जनलोकपाल का मुद्दा और जनांदोलन कोई ऐसी नयी बात नहीं थी पहले भी ऐसे बहुत से मुद्दे लेकर जनांदोलन होते रहे  और थोड़ी बहुत असहज परिस्थितियां सरकार के लिए उत्पन्न करते रहे किन्तु यह आंदोलन अन्ना और केजरीवाल की अगुआई में एक ऐसा आंदोलन बना कि सरकार की जड़ें हिला दी कारण था इसका सोशल साइट्स से भी जुड़ा होना और सोशल साइट्स के माध्यम से जनता के एक बहुत बड़े वर्ग की इसमें भागीदारी और इसी का परिणाम रहा दशकों से लटके जनलोकपाल के मुद्दे पर सरकार का सकारात्मक कदम उठाना।
रेप ,गैंगरेप रोज़ होते हैं थोड़ी चर्चा का विषय बनते हैं और फिर भुला दिए जाते हैं किन्तु १६ दिसंबर २०१२ की रात को हुआ दामिनी गैंगरेप कांड देश ही नहीं सम्पूर्ण विश्व को हिला गया और इसका कारण भी वही था सोशल साइट्स ,सोशल साइट्स के माध्यम से रातो रात ये खबर सारे विश्व में फ़ैल गयी और इन सोशल साइट्स ने ही जगा दी संवेदना सदियों से सोयी उस दुनिया की जो रेप ,गैंगरेप की दोषी पीड़िता को ही मानते रहे सदा सर्वदा और पहली बार दुनिया उठ खड़ी हुई एक पीड़िता के साथ इस अपराध के खिलाफ उसके लिए न्याय की मांग करने को .
महंगाई ,भ्रष्टाचार ,महिलाओं के प्रति बढ़ते अत्याचार मुद्दे पहले भी थे और ऐसी ही निन्दित अवस्था में थे जैसे अब हैं लेकिन सोशल साइट्स ने यहाँ भी अपना सशक्त योगदान दिया और उखाड़ फेंका दस साल से जमी यू,पी,ए.सरकार व् १५ साल से दिल्ली में जमी शीला दीक्षित सरकार को .
किन्तु ऐसा नहीं कि सोशल साइट्स केवल सोशल ही हों, ये सामाजिक रूप से यदि सकारात्मक कार्य कर रही हैं  तो असामाजिकता में भी पीछे नहीं हैं .फेसबुक ट्विटर ऐसी सोशल साइट्स  बन चुकी हैं जिनका इस्तेमाल न केवल समाज को जोड़ने में किया जा रहा है बल्कि समाज तोड़ने में भी ये पीछे नहीं हैं -धार्मिक उन्माद फैलाना हो तो फेसबुक ,साम्प्रदायिक दंगे करवाने हों तो ट्विटर ,लड़की को बहकाना हो तो फेसबुक ,लड़के को पागल बनाना हो तो फेसबुक ,और ये सब साबित होता है इन समाचारों से जो आये दिन हम पढ़ते हैं समाचारपत्रों में ,देखते हैं अपने आस पास -
*मंगलवार २९ जुलाई २०१४ का अमरउजाला इन सोशल साइट्स की असलियत से जुडी तीन ख़बरें प्रकाशित करता है -
१-खटीमा [ऊधमसिंह नगर ]-फेसबुक पर सहारनपुर दंगे से सम्बंधित फोटो टैग कर धार्मिक उन्माद फ़ैलाने के आरोप में पुलिस ने एक युवक को गिरफ्तार किया है .
२-सहारनपुर में दंगों के समाधान के रूप में गुजरात मॉडल की वकालत करने वाले भाजपा विधायक व् पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य सीटी रवि बाद में अपने ट्वीट पर सफाई देते नज़र आये .
३-इंदौर-२३ वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवती का फेसबुक पर फ्रेंड बने युवक ने बुलाकर धोखे से अश्लील वीडियो बनाया .
**मेरठ में भारत से जुडी गोपनीय सूचनाये हासिल करने के लिए सोशल साइट्स ने युवतियों को खास ट्रेनिंग दे रखी है यह खुलासा इंटेलिजेंस द्वारा विज्ञानं शिक्षक दीपक शर्मा से की गयी पूछताछ में हुआ है उनसे एक युवती रानी ने चैटिंग में अपना नाम रेनू रख कहा -
''साइंस से प्यार करती हूँ इसलिए आपको बनाया दोस्त .''
यही नहीं सेना के और भी जवानों को भेजी फ्रेंड रिक्वेस्ट .
यही नहीं आज हाईटेक युवाओं पर आतंकियों की नज़र है और वे इन सोशल साइट्स के माध्यम से इनसे जुड़ रहे हैं .
ये सोशल साइट्स आज हर तरह के काम कर रही हैं एक तरफ ये लोगों की मददगार भी बन रही हैं और एक तरफ चैन हराम करने वाली  भी .यूनिवर्सिटी ऑफ़ अलबामा के असोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ.पाविका शेल्डन ने बताया कि शोध में शर्मीले लोग फेसबुक पर ज्यादा वक्त बिताते हैं .साथ ही एक नए शोध के मुताबिक सोशल मीडिया पर वजन घटाने के तरीके भी लोग सीख रहे हैं लन्दन के इम्पीरियल कालेज में १२ शोध का साझा नतीजा यही है कि सोशल मीडिया से मोटापा घटाने में मदद मिल रही है .साथ ही हमारी सरकार भी इस और अब सक्रियता दिखाकर जनता की मददगार बन रही है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण यह है -

ट्विटर पर अखिलेश चौंका देंगे आपको

ट्वीट करते ही आया सीएम का जवाब
चार दिन बीत चुके थे। वह सारी भाग-दौड़ कर चुका था। यहां तक कि लाइनमैन को घूस देने को भी तैयार था। लेकिन कोई भी उसके घर की बिजली ठीक करने को तैयार नहीं था।
आखिर पांचवे दिन उसने गुस्से में उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को ट्वीट किया। उसने लिखा कि 'नोएडा सेक्टर 52 में पश्चिमांचल विधुत के जेई ने मुझसे घूस मांगी है और चुनौती दी है कि जो करना है कर लो।'
आपको जानकर हैरानी होगी कि उसी दिन शाम को चार बजे मुख्यमंत्री कार्यालय से जवाब आया कि आप अपना फोन नंबर भेजें।
इस प्रकार आज ये सोशल साइट्स दोस्त व् दुश्मन दोनों रूप में हैं जिनसे न मिलते बनता है न बिछड़ते ,न निगलते बनता है न उगलते ,समझ का इस्तेमाल हो तो सही और न हो तो गलत ये विश्वास बनाती भी हैं और बिगाड़ती भी ,सम्बन्ध बनाती भी हैं और तोड़ती भी ,एक तरफ हम इनके माध्यम से विश्व से जुड़ रहे हैं किन्तु ये भी सच्चाई है कि इन्हीं के माध्यम से अपने घर ,समाज से कट रहे हैं उन्हें तोड़ रहे हैं .इसलिए इनके बारे में ,जैसे विज्ञानं के लिए कहा गया है कि -
''science is a good servant but a bad master .''
ऐसे ही इन सोशल साइट्स के लिए भी कहा जा सकता है -
''social sites are good servant but bad master .
अर्थात इन्हें यदि हम अपने ऊपर हावी न कर अपनी समझ से इस्तेमाल करते हैं तो ये सही और यदि इन्हें हावी कर इनके हिसाब से चलते हैं तो गलत .वास्तव में सोशल होना हम पर निर्भर है ,समाज चलना व् समभलना हम पर निर्भर है इन साइट्स पर नहीं ये केवल हमारे हाथ में है कि हम इनके माध्यम से समाज की मदद करते हैं या उसका चैन हराम करते हैं .





फेसबुक दीवार
दीवार
मेरी
आपकी
पडोसी की
हर किसी की .
......................
हिफाज़त करे
मेरी
आपकी
पडोसी की
हर किसी की .
............................
राहत की साँस
मेरी
आपकी
पडोसी की
हर किसी की .
...........................
श्रृंगार भीतरी ,शान बाहरी,
मेरी
आपकी
पडोसी की
हर किसी की .
......................
अब बन गयी
ज़रुरत
दिलों की भड़ास की ,
उत्पाद प्रचार की ,
वोट की मांग की ,
किसी के अपमान की ,
किसी के सम्मान की .
..................................
भरा जो प्यार दिल में
दिखायेगा दीवार पर ,
भरा जो मैल मन में
उतार दीवार पर ,
बेचना है मॉल जो
प्रचार दीवार पर ,
झुकानी गर्दन तेरी
लिखें हैं दीवार पर ,
पधारी कौन शख्सियत
देख लो दीवार पर .
.........................................
मार्क जुकरबर्ग ने
संभाला एक मोर्चा ,
देखकर गतिविधि
बैठकर यही सोचा ,
दीवार सी ही स्थिति
मैं दूंगा अंतर्जाल पर ,
लाऊंगा नई क्रांति
फेसबुक उतारकर ,
हुआ कमाल जुट गए
करोड़ों उपयोक्ता ,
दीवार का ही काम अब
फेसबुक कर रहा ,
जो चाहे लिख लो यहाँ ,
जो चाहे फोटो डाल लो ,
क्रांति या बबाल की
लहर यहाँ उफान लो ,
करे कोई ,भरे कोई ,
नियंत्रण न कोई हद ,
जगायेगा कभी लगे
पर आज बन गया है दर्द .
..........................................
शालिनी कौशिक
[कौशल ]
[PUBLISHED IN JANWANI''S PATHHAKVANI ON 22MAY2015]