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बुधवार, 12 मार्च 2014

दैनिक जागरण पाठकनामा में १२ मार्च २०१४ को प्रकाशित

दैनिक जागरण पाठकनामा में १२ मार्च २०१४ को प्रकाशित
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भाजपा आजकल सर्वाधिक डिमांड में है .जिसे देखो सिर के बल इसमें प्रवेश पाने को भागा जा रहा है और यह प्रवेश यदि कोई यह कहे कि वह देशसेवा के लिए करने जा रहा है तो व्यर्थ भुलावे में डालने की कोशिश कही जायेगी क्योंकि देशसेवा जैसी भावना आजकल के इन राजनेताओं में होना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है ये सब तो मात्र इसलिए हो रहा है क्योंकि जिस दल से कथित देशभक्त ,स्वाभिमानी ताल्लुक रखते हैं अब उस दल को एक डूबते हुए जहाज के रूप में आंक रहे हैं और इसलिए तेजी से भागते हुए उस जहाज में चढ़ने में लगे हैं जिसकी तली में नरेंद्र मोदी जी पहले ही छेद कर चुके हैं और मीडिया का एक बड़ा तबका उनकी लहर बताकर इन सभी को भरमाने में लगा है और ये भागमभाग तभी तक जारी है जब तक टिकट वितरण जारी है उसके बाद किसी के न स्वाभिमान को ठेस लगेगी और न ही किसी को देशभक्ति की सुध रहेगी और ये सब उन नरेंद्र मोदी की लहर के लिए किया जा रहा है जिनके लिए भाजपा स्वयं एक सुरक्षित सीट ढूंढने में अपने पुराने कर्मशील मुरली मनोहर जोशी को ठेस पहुँचाने में लगी है .कहने को नरेंद्र मोदी की लहर है और उनके दमपर न केवल भाजपा उछाल रही है वरन बहुत से अन्य दलों के नेता उन दलों से भागे आ रहे हैं जिनमे उन्हें टिकट की घोषणा तक हो चुकी है अब अगर नरन्द्र मोदी जी की वास्तव में इतनी तेज लहर है तो क्यूँ उन्हें सुरक्षित सीट देने की व्यवस्था की जा रही है और क्यूँ मुरली मनोहर जोशी से जबर्दस्ती उनकी सीट ली जा रही है ?जिस तरह की लहर मोदी की कही जा रही है उसमे या तो उन्हें अपने राज्य से ही लड़ना चाहिए या फिर किसी ऐसी सीट से लड़ने की हिम्मत दिखानी चाहिए जहाँ आज तक भाजपा का खाता खुला ही न हो .आखिर मोदी को अपने राज्य से या फिर किसी असुरक्षित सीट से खड़े होने में डर क्यूँ है क्या वे नहीं जानते -
गिरते हैं शह-सवार ही मैदाने जंग में ,
वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चले .''
ये आदर्श तो मोदी को उपस्थित करना ही चाहिए आखिर जिस जहाज पर नेताओं की फ़ौज सवार हो रही है उसके कैप्टेन तो मोदी ही हैं और यदि कैप्टेन ही अपना हौसला खोये हुए हो तो बाकी यात्रियों का क्या होगा ?
शालिनी कौशिक
[एडवोकेट ]
कांधला [शामली ]

सोमवार, 10 मार्च 2014

दैनिक जागरण पाठकनामा में १० मार्च २०१४ को प्रकाशित

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चुनावों की उद्घोषणा हो गयी और सत्ता-सुंदरी को पाने में लगे देश के दो प्रमुख दल अपने कारनामे जनता के समक्ष खुलेआम करने लगे .केजरीवाल की आप तो आयी ही भारतीय राजनीति में उथल -पुथल मचाने है और उसे उसके मंसूबों में सफल होने में भाजपा इस तरह से सहयोग करेगी इसकी झलक तो बहुत पहले ही दिल्ली विधानसभा में भाजपा की किरकिरी में दिखाई दे गयी थी .आप राजनीति में नयी है और उसका अभी इसी कारण कोई राजनैतिक इतिहास नहीं है इसलिए वह जिस पर जो चाहे इलज़ाम लगा सकती है और इसलिए उसने अपने को प्रसिद्ध करने के लिए कॉंग्रेस और भाजपा इन दोनों दलों को घेरने व बदमान करने की रणनीति अपनायी और चूँकि राजनीति के दिग्गज जानते हैं कि इस तरह की आरोपों से राजनीतिज्ञों को दो-चार होना ही पड़ता है इसलिए वे मीडिया के सामने ही अपनी भड़ास निकाल लेते हैं अंदर से इस सम्बन्ध में कोई वैरभाव नहीं रखते क्योंकि खुद वे भी तो यही सब करते ही रहते हैं किन्तु जहाँ इस तरह के आरोपों पर पार्टी व् उसके कार्यकर्ता गम्भीर हो तो वहाँ चोर की दाढ़ी में तिनका नज़र आना स्वाभाविक है .आज तक देश में हुए विकास कार्यों को नकारकर बस अपने गुजरात के विकास के गुणगान करने वाले मोदी के गुजरात विकास मॉडल पर ही जब केजरीवाल ने ऊँगली उठा दी और उसकी असलियत जनता के सामने रखने की कोशिश की तो मोदी का और उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार प्रोजेक्ट करने में लगे भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ताओं का तिलमिलाना स्वाभाविक भी था और दाल के भीतर के काले को दिखने के लिए पर्याप्त भी .अब देश भर में आप व् भाजपा भिड़ी हुई है और वह जनता जो इनके हाथों में देश सौंपने के मंसूबे रखती है वह सोच के गहरे भंवर में आखिर देश के सँभालने के बड़े बड़े दावे करने वाले इन परिस्थितियों तक को नहीं संभाल पा रहे ये देश क्या खाक संभालेंगे .
शालिनी कौशिक
[एडवोकेट ]
कांधला [शामली ]

मंगलवार, 4 मार्च 2014

जागरण जंक्शन ब्लॉग्स में ४ मार्च २०१४ को प्रकाशित


Assam woman dies of burn wounds, police say she's not the one who kissed Rahul

मीडिया और सियासत यदि आज के परिप्रेक्ष्य देखा जाये तो एक सिक्के के दो पहलू बनकर रह गए हैं .आज की परिस्थितियों में मीडिया पूर्णरूपेण इसी ताक में लगा है कि किसी भी तरह कोई भी मुद्दा सियासी राहों में उछलकर हड़कम्प मचा दिया जाये.कोई वेबसाइट और कोई भी समाचार आज इस समाचार को अपने मुख्य पृष्ठ पर स्थान देने से नहीं चूका कि ''राहुल गांधी को चूमने पर पति ने की हत्या ''.राहुल गांधी आज अपनी कर्मशील कार्यशैली और जगह जगह जाकर जनप्रतिनिधियों से मुलाकात कर उनकी समस्याओं को जानकर उनके निवारण सम्बन्धी कार्यक्रम को अपने दल के घोषणा पत्र में स्थान देने में व्यस्त हैं और उनका यह कार्यक्रम जनता में खासा लोकप्रिय हो रहा है किन्तु मीडिया ये सब नहीं चाहता उसकी चाहत एकमात्र यही है कि ''जिसे मीडिया उभारे जनता उसे ही स्वीकारे '' और इसलिए बार-बार राहुल गांधी का नाम उछालकर उनके अभियान में रुकावटें पैदा करने में लगा है नहीं देख रहा है कि वह अपने मुख्य कर्त्तव्य से इस नाते विमुख हो रहा है जिसका आगाज़ और अंजाम दोनों ही सच्चाई और ईमानदारी को साथ लेकर अन्याय व् अत्याचार का नाश करने में है .
औरत आरम्भ से ही आदमी द्वारा अपनी संपत्ति की तरह समझी गयी ,गुलाम से बढ़कर उसकी कभी आदमी ने कोई हैसियत होने नहीं दी .आदमी के अनुसार औरत बस उसकी कठपुतली बनकर रहे और अपना कोई अलग अस्तित्व कभी न समझे .सोमेश्वर चुटिया एक ऐसे व्यक्ति का नाम है जिसने पुरुष सत्तात्मक समाज की इसी मानसिकता का प्रतिनिधित्व कर अपनी पत्नी बॉँटी चुटिया को जिन्दा जलाकर मार डाला ,अब इस बात के पीछे ये कहा जा रहा है कि उसने उसे राहुल गांधी के कार्यक्रम में जाने से रोका था ,उसने उसे राहुल गांधी को चूमने के कारण जलाकर मार डाला .पडोसी ये कारण कह रहे हैं तो प्रशासन उसकी वहाँ उपस्थिति से ही इंकार कर रहा है. कोई मतलब नहीं इन बातों का ,मामला सीधा और साफ है पुरुष और नारी का सम्बन्ध ,जिसे नारी द्वारा देवता का दर्जा दिया गया उसी ने नारी को पैर की जूती समझा ,कोई नहीं कह रहा कि क्या हक़ बैठता है पुरुष को नारी को जिन्दा मार देने का ?क्या नारी का जीवनदाता वह है ?अगर नारी का यह आचरण उसे नापसंद है तो वह स्वयं को उससे अलग कर सकता है ,स्वयं का वह जो चाहे कर सकता है किन्तु कोई अधिकार उसे इस बात का नहीं है कि वह उसे इस तरह से या कैसे भी ज़िंदगी से महरूम कर दे ,पर कहीं भी यह आवाज़ नहीं उठायी जा रही है .वही मीडिया जो नारी सशक्तिकरण के लिए कभी बेटी ही बचाएगी जैसे अभियान चलाता है ,तो कभी मोमबत्ती जलाकर सोये समाज को जागने के लिए ललकारता है वह ऐसे मामले में सही पथ का अनुसरण क्यूँ नहीं करता ?क्यूँ नहीं इस समाचार का शीर्षक ''पति द्वारा पत्नी की जलाकर हत्या ''रखा गया ?पत्नी वह जो कि सामान्य घरेलू महिला न होकर बेकाजन ग्राम पंचायत की पार्षद थी ,क्यूँ मीडिया को नहीं दिखी यहाँ विकास की राहों पर कदम बढ़ाती पत्नी के लिए पति ईर्ष्या ?समाचार का शीर्षक कहें या मामले का एकमात्र सत्य ,वह यही है कि ''पति के दिल की आग ने पत्नी को किया राख ''क्यूँ मीडिया ने इस सत्य को नहीं स्वीकारा ?क्यूँ नहीं कहा कि आदमी को तो बस एक बहाना चाहिए औऱत पर कहर ढाने का और औरत जहाँ चूक जाती है वहाँ ऐसा ही अंजाम पाती है और हद तो ये है कि ऐसे समय पर हर वह ऊँगली जिसे किसी को निशाना बनाना हो वह उस तरफ उठकर अपना उल्लू सीधा कर जाती है और यही यहाँ हो रहा है .पुरुष के दमनात्मक रवैये की शिकार औरत की हालत का जिम्मेदार राहुल गांधी को बनाकर अपना उल्लू ही तो सीधा किया जा रहा है .
''औरत पे ज़ुल्म हो रहे ,कर रहा आदमी ,
सच्चाई को कुबूलना ये चाहते नहीं .
गैरों के कंधे थामकर बन्दूक चलाना
ये कर रहे हैं काम ,मगर मानते नहीं .''
[जागरण जंक्शन ब्लॉग्स में ४ मार्च २०१४ को प्रकाशित ]

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शालिनी कौशिक
[कौशल ]

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

दैनिक जागरण पाठकनामा में २७ फरवरी २०१४ को प्रकाशित


दैनिक जागरण पाठकनामा में २७ फरवरी २०१४ को प्रकाशित
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लगता है कि चुनावों का समय बहुत करीब आ गया है और अब भाजपा जो मूलतः हिंदुओं को साथ लेकर चलने का दम भरती है और हिंदुओं के ही साथ से सत्ता में अपने लिए कुर्सी पक्की करने की कोशिश करती है अब मुस्लिमों के वोट भी अपने लिए महत्वपूर्ण समझ रही है और उनसे अपनी किसी गलती के लिए सर झुकाकर माफ़ी मांगने को भी स्वयं को प्रस्तुत कर रही है .राजनाथ जी कहते हैं कि यदि हमसे कोई भी गलती [कोई भी गलती ]का यदि आकलन किया जाये तो जो भाजपा ने आज तक किया है वह मात्र गलती नहीं कही जा सकती वह गुनाह कहा जाता है .बाबरी मस्जिद का विध्वंस न केवल धर्म विशेष के इबादत स्थल का विनाश था बल्कि वह हमारे देश की सहिष्णु संस्कृति का भी विनाश था और ऐसा करना भाजपा ने केवल अपने सत्ता की राह को सुविधाजनक बनाने के लिए किया और ऐसा कर वह जिस समुदाय को अपने से जोड़ रही थी उसकी महत्वाकांक्षा राम मंदिर के रूप में भी वह पूर्ण नहीं कर पायी बल्कि उसके कितने ही नवयुवकों को इसी भाजपा ने धर्म की ऐसी आग में धकेला कि उन्हें पूरी तरह से तबाह कर दिया .गोधरा के दंगे इस बात का प्रमाण हैं कि मोदी कितने सहिष्णु हैं देश के इन धर्मावलम्बियों के प्रति .भाजपा की इन गतिविधियों के कारण देश का नाम आज तक विश्व में कलंकित है और कलंकित हैं स्वयं इनके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी जी .माफ़ी तो भाजपा को मांगनी ही होगी न केवल अपने पूर्व के गुनाहों की बल्कि वर्त्तमान में मोदी को अपना उम्मीदवार बनाकर सारे देश में खुलेआम घूमकर इन धर्मावलम्बियों में भय की राजनीति करने की खुली छूट देने की भी.अब ये माफ़ी मांगने की अक्ल भाजपाईयों में कब आती है ये तो वक़्त ही बतायेगा .
शालिनी कौशिक
[एडवोकेट]
कांधला [शामली ]

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

{जागरण जंक्शन में १० फरवरी २०१४ को प्रकाशित }

{जागरण जंक्शन में १० फरवरी २०१४ को प्रकाशित }

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ए ! सियासत के सरपरस्तों -ज़लज़ला आने को है-जागरण फोरम


हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हूडा को पिछले दिनों एक युवक के आक्रोश का शिकार होना पड़ गया जिसे उन्होंने माफ़ कर दिया किन्तु कौन कौन किस किस को माफ़ करेगा क्योंकि आने वाला समय बता रहा है कि यह आक्रोश ऐसे ही थमने वाला नहीं है ,यह फैलेगा क्योंकि जिस वजह से उस युवक में इतना आक्रोश उत्पन्न हुआ उसे न तो हमारी राजनीति ख़त्म होने देगी और न ही उस वजह की पोषक जनता .
जनार्दन द्विवेदी ने आर्थिक आरक्षण की बात उठायी -

Senior Congress leader Janardan Dwivedi wants end to reservation on caste lines

NEW DELHI: At a time when quota is the buzz word in politics, senior Congress leader Janardan Dwivedi has called for an end to reservation on caste lines and urged Rahul Gandhi to introduce quota for financially weaker sections bringing all communities under its ambit.
तो राजनीति के गलियारों में हड़कम्प मच गया कि कहीं ऐसा आरक्षण लागु हुआ तो हम राजनेता ,जिन जातियों के खैरख्वाह बनकर ऐशो-आराम की ज़िंदगी बसर कर रहे हैं ,क्या करेंगें और आखिर जनार्दन द्विवेदी की पार्टी कॉंग्रेस की हाईकमान सोनिया गांधी तक को कहना पड़ गया कि जाति आधारित आरक्षण लागु रहना चाहिए .कहना आसान है उनके लिए किन्तु जिन्हें उस आरक्षण को झेलना पड़ रहा है उनके लिए उसे झेलना मुश्किल .ये आरक्षण डॉ.भीमराव आंबेडकर ने संविधान लागू होने के दस वर्ष तक लागू करने की बात कही थी किन्तु आज 64 वर्षों बाद भी ये आरक्षण लागू है और निरंतर बढ़ता ही जा रहा है .कहीं अल्पसंख्यक ,कहीं महिला ,कहीं दलित, कहीं पिछड़े तो कहीं अनुसूचित जाति जनजाति के लिए आरक्षण लागु किया जा रहा है और परिणाम यह है कि योग्यता अंधेरों में धकेली जा रही है या फिर इस तरह के आक्रोश में उबल रही है .
ये आरक्षण का ही असर है कि इंटरमीडिएट को पढ़ाने आई अध्यापिका पाठ्यक्रम की किताब और उसकी गाइड सामने रख बच्चों को पढ़ाती है .ये आरक्षण का ही दुष्प्रभाव है कि क्लर्क पद पर बैठे आदमी को एक आवेदन पत्र तक लिखना नहीं आता .न्यायालय में बैठे न्यायाधीश को कानून की ए.बी.की.डी. भी नहीं आती ,प्रधान बनी औरत जनता में कभी काम करती नज़र नहीं आती नज़र आता है तो उसका पति जिसका नया रुतबा बन चुका है प्रधान पति के रूप में .
ये आरक्षण का ही असर है कि स्नातक -परास्नातक की डिग्री प्राप्त दुकान खोलकर बैठे हैं ,कोचिंग इंस्टीटूट चला रहे हैं .एक तरफ जहाँ देश में न्यायालयों में न्यायधीशों की कमी है और इसी कमी को दूर करने के लिए एल एल.बी.की डिग्री प्राप्त करने के बाद अधिवक्ता बनने के लिए एक साल की प्रैक्टिस की बाध्यता समाप्त की गयी किन्तु आरक्षण की मार ने कानून की अच्छी समझ वाले युवाओं को वकालत ही करने के लिए विवश कर दिया या फिर मृतक आश्रित के रूप में नौकरी कर कलम घिसने के लिए मजबूर कर दिया .
आज सामान्य वर्ग के लिए इस आरक्षण के कारण ही नौकरी मिलना ''दूर के ढोल सुहावने ''ही हो गए हैं और इस कारण युवा वे जो अच्छे समृद्ध परिवारों से हैं वे सरकारी नौकरी से इतर कार्यक्षेत्र तलाश रहे हैं या फिर आत्महत्या को गले लगा रहे हैं और ये सब न कर पाने की स्थिति में या अपने परिवार के बदतर स्थिति को देख मुख्यमन्त्री पर हाथ उठा रहे हैं और कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं .आरक्षण अगर देखा जाये तो एक मात्र बैसाखी ही है जिसका सहारा इन जातियों को पंगु ही बना रहा है .संविधान लागू होने के बाद इतने वर्षों बाद तक आरक्षण का जारी रहना यह बताता है कि यह व्यवस्था इनके विकास में सहायक न होकर बाधक ही बन गयी है ,ये इसके आदी हो गए हैं और इस हटकर अब इनके लिए जीना ही सम्भव नहीं लगता . मैंने देखा है कि एक आदमी जो सड़क पर घिसट-घिसट कर चलता है उसे सरकार की तरफ से विकलांग के लिए मिलने वाली बाइसिकिल मिलने पर वह उसे ले तो लेता है किन्तु उस पर बैठता नहीं वह सड़क पर वैसे ही अपने हाथों और पैरों के माध्यम से चलता रहता है ऐसे ही ट्यूशन से पढ़ने वाले बच्चे कक्षा में अध्यापक द्वारा पूछे गए सवाल अपने पास लिख लेते हैं और अगले दिन अपने ट्यूटर से पूछकर तो खूब हाथ उठा उठाकर जवाब देते हैं किन्तु जब उनसे अध्यापक द्वारा सवालों का उसी दिन एकदम जवाब माँगा जाता है तो एक दूसरे की बगलें झांकते नज़र आते हैं .आज आरक्षण ने यही काम किया है सफलतापूर्वक इन जातियों की योग्यता को ख़त्म कर इन्हें कठपुतली बनाने का .
जनार्दन द्विवेदी जी का आरक्षण के लिए आर्थिक आधार की बात कहना वर्त्तमान परिस्थितियों में पूरी तरह से उपयुक्त है क्योंकि आर्थिक आधार के अंतर्गत जो भी आज के समय में पिछड़ा हुआ है वह इस दायरे में आ जायेगा फिर एक तरफ तो देश में जाति प्रथा को हटाने की बात कही जाती है और दूसरी तरफ आरक्षण का आधार जातियों को मानकर उन्हें बाँट दिया जाता है .आज अगर इन राजनीतिक दलों में से किसी में भी देश हित व् जन हित की भावना है तो उसे आर्थिक आधार को ही आरक्षण का मुद्दा बनाना होगा क्योंकि जो स्थिति इस वक़्त इन राजनीतिक दलों ने पैदा की है उसमे कभी भी विकास में समानता नहीं आ सकती .ऐसे में देश मात्र एक तराज़ू के पलड़ों की तरह बँटकर ही रह जायेगा .आज जो पिछड़े हैं वे आगे बढ़ जायेंगें और जो उच्च जातियां हैं वे पिछड़ जाएँगी जबकि कहने को राजनीतिक दलों का उद्देश्य सभी का हित है ,सभी को साथ लेकर चलने का ही ये स्वप्न देखते हैं जबकि काम जो करते हैं वह केवल बाँटने का ही करते हैं इन्हें अपने गिरेबान में झांककर देखना होगा और अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करना होगा क्योंकि जब तराजू के दोनों पलड़ों में बराबर वज़न होगा तभी तो वे समान होंगे और ऐसा आर्थिक आधार पर आरक्षण से ही सम्भव है और यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो आज का थप्पड़वाद कल का दंगा वाद ,बलवावाद ,चाकू वाद ,गोली वाद किसी में भी बढ़ सकता है क्योंकि -
''दबी आवाज़ को गर ढंग से उभारा न गया ,
सूने आँगन को गर ढंग से बुहारा न गया ,
ए ! सियासत के सरपरस्तों ज़रा गौर से सुन लो ,
ज़लज़ला आने को है गर उनको पुकारा न गया .''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शनिवार, 25 जनवरी 2014

दैनिक जागरण पाठकनामा में २५ जनवरी २०१४ को

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अमेठी में राहुल गांधी को दिखाए गए काले झंडे समाचार यही प्रदर्शित करता है कि विपक्ष के पास अपना कोई तरीका सत्ता में आसीन कॉंग्रेस को आईना दिखाने के लिए फिलहाल तो नहीं है क्योंकि वह केवल वही वही कर रहा है जो कॉंग्रेस बहुत पहले और बहुत बार कर चुकी है और यह तो विपक्ष को जानना ही होगा कि इन सब पुराने तरीकों से जनता उब चुकी है और क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है इसलिए यदि वह कुछ नया कर सकता है तो करकर दिखाए और वहाँ दिखाये जहाँ वास्तव में दाल काली हो .राहुल गांधी को इस तरह से अपनी राजनेतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए शिकार बनाया जाना एक जंग खाये हुए हथियार का इस्तेमाल ही कहा जायेगा क्योंकि राहुल गांधी अपने क्षेत्र के लोगों को अपने घर के सदस्यों की तरह ही व्यवहृत करते हैं और राजीव गांधी जी पहले भी अमेठी को अपना दूसरा घर कह चुके हैं और रही कुमार विश्वास की बात तो उनका जवाब तो राहुल गांधी जी ने ही बखूबी दे दिया है वे पिकनिक की बात करते हैं और राहुल कम बोलकर काम करने की .अब ये तो साफ़ है कि काम ज्यादा महत्वपूर्ण है या पिकनिक .कुमार विश्वास को अपनी भाषण शैली में अवश्य सुधार करना होगा .
शालिनी कौशिक
[एडवोकेट]
कांधला [शामली]

बुधवार, 22 जनवरी 2014

दैनिक जागरण पाठकनामा में 22.1.2014 को

दैनिक जागरण पाठकनामा में 22.1.2014 को

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सरकार चुनावों को देखते हुए जनता के हित साधकर अपने हित साधने में लगी है .जैन समुदाय को राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्जा तो सरकार ने दे दिया किन्तु जो जनता के साथ न्याय किये जाने की बात है उस ओर सरकार उदासीन है .पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिवक्ता पिछले कई वर्षों से यहाँ हाईकोर्ट बेंच की मांग में लगे हैं और यह मांग  न केवल उनके व्यवसायिक हित को देखते हुए पूरी की जानी चाहिए बल्कि यहाँ की जनता के लिए न्यायिक सुविधाओं की उपलब्धता हेतु भी अतिशीघ्र पूर्ण की जानी चाहिए .

शालिनी कौशिक
[एडवोकेट]
कांधला [शामली ]