लेखन न केवल शौक बल्कि ज़िंदगी को जीने की ज़रुरत बन गयी है .नहीं बर्दाश्त कर पाती हूँ बहुत कुछ ऐसा अनर्गल प्रलाप जो कोई भी किसी भी कुछ न कहने वाले को कहे जाये और बस वहीँ चोट करती हूँ जहाँ देखती हूँ कि अत्याचार कुछ ज्यादा बढ़ रहा है और पा जाती हूँ समाचार पत्रों में स्थान और उस स्थान को कैसे सहेजूँ तो बना लिया एक ब्लॉग और किया आपसे इसको भी साझा .आप मेरे इस प्रयास के बारे में क्या सोचते हैं ज़रूरी समझें तो बताएं अवश्य .
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रविवार, 19 जुलाई 2026
सोमवार, 16 मार्च 2026
दैनिक जनवाणी 16 मार्च 2026
माननीय उच्चतम न्यायालय ने पूरे देश के ज़िला जजों को अपने अधिकार क्षेत्र के तहत आने वाले बार एसोसिएशनों की एग्जीक्यूटिव कमेटियों/गवर्निंग बॉडीज़ में महिला सदस्यों को नॉमिनेट करने का अधिकार दिया, ताकि उनमें 30 प्रतिशत महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मानदंड पूरा हो सके।
स्पष्ट तौर पर यदि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय की तह में हम जाते हैँ तो यह निर्णय महिला अधिवक्ताओं के बार एसोसिएशन में प्रतिनिधित्व के मानदंड की पूर्ति करने से कहीं ज्यादा बेंच के अधिवक्ता संग़ठन में अनधिकृत हस्तक्षेप को साबित कर रहा है.
बार एसोसिएशन में आज तक जो भी अधिवक्ता पदाधिकारी या सदस्य होते आ रहे हैं वे चुनाव लड़कर ही आते हैँ, किसी तरह का कोई आरक्षण यहाँ लागू नहीं किया जाता है. महिला अधिवक्ताओं को कार्यकारिणी में आने से रोकने का तो कोई एजेंडा किसी एसोसिएशन में लाया ही नहीं जाता, जो भी महिला अधिवक्ता चुनाव लड़कर पदाधिकारी या सदस्य बनना चाहती है वह चुनाव लड़कर एसोसिएशन में पद धारण कर सकती है स्वयं मैंने ही 2018 में निर्विरोध रहकर और 2020 में 18 वोट से जीतकर बार एसोसिएशन कैराना में कनिष्ठ उपाध्यक्ष के पद पर कार्य किया था. चुनाव लड़कर जीते हुए एडवोकेट वकीलों के ही प्रतिनिधि होते हैँ तो उनके ही हितों की बात करते हैँ अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जिला जज द्वारा नॉमिनेट प्रतिनिधि वकीलों के प्रतिनिधि न रहकर बेंच के शैडो प्रतिनिधि बनकर ; बेंच-बार विवाद की स्थिति में, उनके हितों के ज्यादा बड़े प्रतिनिधि होंगे, जो कि सीधे सीधे वकीलों की एकता में सेंध लगाकर उनके न्यायहितों पर कुठाराघात है।
बार कॉउसिल ऑफ इंडिया को इसका प्रबल विरोध करते हुए अधिवक्ता समुदाय को '' फ़ूट डालो राज करो '' के कुचक्र से बचाना चाहिए.
अधिवक्ता एकता जिन्दाबाद
द्वारा
शालिनी कौशिक
एडवोकेट
कैराना (शामली )
मंगलवार, 5 अगस्त 2025
शनिवार, 12 अप्रैल 2025
सोमवार, 7 अप्रैल 2025
रविवार, 23 मार्च 2025
शुक्रवार, 21 मार्च 2025
गुरुवार, 20 मार्च 2025
गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025
शनिवार, 1 फ़रवरी 2025
मंगलवार, 21 जनवरी 2025
सोमवार, 20 जनवरी 2025
बुधवार, 15 जनवरी 2025
सोमवार, 6 जनवरी 2025
शनिवार, 26 अक्टूबर 2024
गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024
दैनिक जनवाणी दिनाँक 07 अक्टूबर 2024
नारी पर अपराध "छोटे अपराध" - यति नरसिंहानंद
आज यति नरसिंहानंद विवादों में हैं. ऐतिहासिक और आध्यात्मिक चरित्रों के बारे में अनाप शनाप बयानों को लेकर. साथ ही, उनकी सोच बता रही है भारतीय पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्री की दयनीय दशा के बारे में. नरसिंहानंद कहते हैं कि - आज मैं केवल एक व्यक्ति के प्रति संवेदना जताता हूं। मेघनाथ को हम हर साल जलाते हैं। मेघनाथ जैसा चरित्रवान व्यक्ति इस धरती पर दूसरा कोई पैदा नहीं हुआ। हम हर साल कुंभकरण को जलाते हैं। कुंभकरण जैसा वैचारिक योद्धा इस धरती पर पैदा नहीं हुआ। उनकी गलती ये थी कि रावण ने एक छोटा सा अपराध किया।
अब यदि हम छोटे से अपराध की भारतीय कानून के मुताबिक परिभाषा पर जाते हैं तो पहले भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 95 और अब भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 33 में जिन अपराधों को छोटे अपराधों की श्रेणी में रखा गया है उनके लिए कहा गया है कि - "कोई बात इस कारण से अपराध नहीं है कि उससे कोई अपहानि कारित होती है या कारित की जानी आशयित है या कारित होने की सम्भाव्यता ज्ञात है, यदि वह इतनी तुच्छ है कि मामूली समझ और स्वभाव वाला कोई व्यक्ति उसकी शिकायत नहीं करेगा."
ऐसे में, साफतौर पर यति नरसिंहानंद रावण द्वारा माता सीता के हरण को एक छोटा सा अपराध कह रहे हैं. नरसिंहानंद जैसे पुरुषों के लिए जो एक " छोटा सा अपराध " वह एक स्त्री, पतिव्रता नारी की मिसाल माता सीता की जिंदगी बर्बाद कर देता है, एक देवी की पवित्रता पर अयोध्या की प्रजा में उठी छोटी सी ध्वनि कि माता सीता रावण के घर रहकर आई है, उनके जीवन से सौभाग्य को, पति के साथ रहने के सुख को उनकी गर्भावस्था में ही दूर कर देती है. महर्षि वाल्मीकि द्वारा संरक्षण में रहने पर भी माता सीता से अयोध्या की प्रजा पुनः अग्नि परीक्षा की इच्छा रखती है, लव कुश श्री राम के पुत्र होने के बावजूद पिता श्री राम के राज्य को प्राप्त नहीं कर पाते और ये सब जिस रावण के दुष्कृत्य के कारण होता है उसे यति नरसिंहानंद छोटा सा अपराध कहते हैं.
ये है नारी के प्रति भारतीय आधुनिक संत समाज की सोच, जिसके अनुसार नारी पर हो रहे अपराध छोटे अपराध हैं और भारतीय कानून के अनुसार छोटे अपराध वे हैं जिनकी कोई शिकायत नहीं करनी चाहिए और अंततः नारी को इस सोच को देखते हुए चुप ही रहना चाहिए.
शालिनी कौशिक
एडवोकेट
कैराना (शामली)
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